
औरंगज़ेब ने 2 अप्रेल 1679 को हिंदुओं पर जज़िया कर जो अकबर के समय से बंद था फिर से सख़्ती से लिए जाने की आज्ञा दी । तब दिल्ली और उसके आसपास के हज़ारों हिंदू यमुना नदी के किनारे (जहाँ बादशाह झरोखा दर्शन देता था) के नीचे इकट्ठे होकर जज़िया माफ़ करने की प्रार्थना करने लगे मगर औरंगज़ेब ने उस पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया । बादशाह जब दूसरे शुक्रवार को नमाज़ पढ़ने के लिए जामा मस्जिद जाने लगा तब लाल क़िले से जामा मस्जिद जाने वाले मार्ग पर भीड़ लग गई और बादशाह को आगे जाने का रास्ता नहीं मिला । बादशाह के बहुत कहने पर भी जब वे नहीं हटे तब बादशाह ने हाथियों को आदमियों के ऊपर हूलने की आज्ञा दे दी जिससे बोहोत से आदमी कुचल दिये गए । ये सब होने पर भी धर्मांध औरंगज़ेब ने जज़िया कर नहीं हटाया ।चारों ओर इस धर्म संबंधी सख्ती के कारण भारत के अलग अलग भागों के सिख, मराठे और राजपूत उसके विरोधी हो गए । मेवाड़ महाराणा राज सिंघ जी ने बादशाह औरंगजेब को पत्र लिखा और उसमें यह तक कह दिया कि यदि आपको अपने ही धर्म के आग्रह ने इस पर उतारू किया है तो सबसे पहले आमेर नरेश राम सिंघ जी से, जो हिंदुओं का मुखिया है,जज़िया वसूल करे बाद में मुझ से ।
वैसे जज़िया कर राज्य में रहने वाले ग़ैर मुस्लिमों से प्रतिवर्ष लिया जाने वाला अपमानजनक कर था ।जज़िया कर देने वाले को जिम्मी कहा जाता था । उसे स्वयं नंगे पैर चलकर कर लेने वाले अफ़सर के पास जाना पड़ता था । अफ़सर तो बैठा रहता और जिम्मी को उसके आगे खड़ा रहना पड़ता था । अफ़सर कहता कि “ए जिम्मी जज़िया दे” । औरंगज़ेब ने इसे इतनी सख़्ती से लिया कि उसकी मौत के 13 वर्ष बाद मुग़ल सल्तनत की नींव हिलने लगी तब बादशाह फ़रूख़्सियर को लाचार होकर इसे हटाना पड़ा ।
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