बात उस समय की है जब झुंझूनू के नवाब शहादत खां हुआ करते थे और उनकी अपने भाई बंधुओं से बनती नहीं थी ।या यूँ कहलो उनके कायमखानी भाई बंधु उनसे नाख़ुश थे । वह नवाब को सहयोग करने की बजाय तंग किया करते थे इसलिए नवाबसाब ने हांसी से शेख मुजफ़्फ़र के पुत्र मोहम्मद यूसुफ़ को बुलवाया और रियासत का इंतज़ाम मोहम्मद यूसुफ के सुपुर्द कर दिया । इससे नवाब के रिश्तेदार और भी नाराज़ हो गए । एक दिन जब नवाबसाब बादशाह से मुलाक़ात के लिए दिल्ली गए हुए थे तब मौका पाकर (घोड़िवारा के दराब खां,बड़वासी नवाब के भाई सरमस्तखां,नरसिंघाणी के एलमाणों की अगुवाई में) नवाबसाब के रिश्तेदारों ने मुहम्मद यूसुफ़ और उसके साथ ही चंद पठानों को अचानक आक्रमण कर ख़त्म कर दिया । तभी नवाब की टुकड़ी वहाँ आ गई । नवाब के सैनिकों को देखकर ये लोग वहाँ से भागे तो नवाब के सैनिकों ने उनका पीछा किया और घोड़ीवारा के पास इनकी मुठभेड़ हुई । दराब खां इस मुठभेड़ में काम आ गए और उनका मुसाहिब गुसाईं और कुछ अन्य साथी भी काम आ गए । इस बात की ख़बर जब नवाब शहादत खां को दिल्ली में लगी तो वो बहुत नाराज़ हुए और मोहम्मद यूसुफ के रिश्तेदार भी भड़क गए और दोनों बदला लेने की तलाश में लग गए । मगर नवाब के कुछ रिश्तेदारों ने मुहम्मद यूसुफ़ के रिश्तेदारों से सुलह करने के लिए दराब खां और सरमस्त खां की पोती की शादी कायम मोहम्मद और अहमद अली से कर दी और इस तरह झगड़ा ख़त्म किया ।अब दराब खां की मज़ार घोड़ीवारा में है और गुसाईं जी का देवरा भी पास में ही बना हुआ है ।मोहम्मद यूसुफ़ की मज़ार भी झुंझुनू में ही है ।

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